दर-ब-दर जो थे वो दीवारों के मालिक हो गये
मेरे सब दरबान दरबारों के मालिक हो गये
लफ़्ज़ गूँगे हो चुके, तहरीर अंधी हो चुकी
जितने मुख़बिर थे वे अख़बारों के मालिक हो गये
लाल सूरज आसमाँ से घर की छत पर आ गया
जितने थे बेकार सब कारों के मालिक हो गये
देखते ही देखते कितनी दुकानें खुल गईं
बिकने जो आए थे बाज़ारों के मालिक हो गये
सर बकफ़ थे तो सरों से हाथ धोना पड़ गया
सर झुकाए थे वो दस्तारों के मालिक हो गये
Rahat Indori