K n

देखो ये कैसे मंज़र हैं,
दिल में पलते कितने डर हैं।

वो, जो सोते हैं महलों में,
अंदर से कितने बेघर हैं।

कितनी मीठी बोली उसकी,
जिसके हाथों में खंजर हैं।

किससे अब ख़तरा है किसको,
पानी है और मेरे पर हैं।

भैंस है उसकी जिसकी लाठी,
कुछ जुमले कितने पत्थर हैं।

चेहरों पर मुस्कान उगा ली,
लेकिन ज़ेहन-ओ-दिल बंजर हैं।

सच कहना और मुँह पर कहना,
सब इल्ज़ाम हमारे सर हैं।

रस्ता है पुरख़ार ‘कमल जी’,
अब अपना आसान सफ़र है।
K n

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