कहूँ न कहूँ

कॉलेज का यौम-ए-आख़िर है सोच रहा हूँ
शर्म से आज छुड़ा ही डालूँ अपना दामन
तुम से माँगूँ कुछ लम्हे मैं अपनी ख़ातिर
आज इजाज़त दे दे गर सीने की धड़कन

मौसम की कुछ बात करूँ कुछ शहर की तुम से
बातों बातों में अपने हालात भी कह दूँ
वो सारे अशआर जो तुम पर कहे हैं मैं ने
अर्ज़ करूँ और उन में दिल की बात भी कह दूँ

वो सारे ख़त जो लिक्खे और भेज न पाया
आज वो सारे पढ़ कर तुम को ख़ुद ही सुना दूँ
आज उठा दूँ पर्दा हर इक राज़ से अपने
वो जो अब तक सीने में है तुम्हें बता दूँ

हो सकता है तुम भी दिल ही दिल में मुझ से
इश्क़ किया करती हो कहने से डरती हो
शायद मेरे उल्फ़त के पैग़ाम को पा कर
तुम हाँ कह दो और मेरी दुनिया ही बदल दो

लेकिन ये भी तो मुमकिन है और कोई हो
मेरे जैसा दीवाना चाहत में तुम्हारी
और समेटे अपनी सारी हिम्मत वो भी
करता हो इज़हार-ए-मुहब्बत की तैयारी

ना-इंसाफ़ी होगी उस के साथ बड़ी ये
गर मैं तुम से तुम को माँगूँ और पा भी लूँ
इक जज़्बा रह रह कर मुझ से ये कहता है
पहले सा ख़ामोश रहूँ होंठों को सी लूँ

सब को राह-ए-इश्क़ की मंज़िल मिल जाती हो
ऐसा इस दुनिया में आख़िर कब होता है
लाखों ग़ूँचे बे-चटखे ही मुरझाते हैं
एक अगर फिर मुरझा जाए तो भी क्या है
Anchal Maurya