Nivedan Mishra

उसने आँखों से यूँ उतारे लोग
हो गए इक तरफ़ किनारे लोग

ख़ामुशी सुनते ही चले आए
उसने आँखों से भी पुकारे लोग

ढ़ूँढ़िए इस ज़मीन के अंदर
खो चुके हैं बहुत हमारे लोग

जीत लेते हैं एक दिन सब कुछ
याद रखिएगा आप हारे लोग

आज सैलाब का है अंदेशा
और आँखों में इतने सारे लोग

इस तरफ जाइए जहन्नुम है
मुस्कुराते मिलेंगे सारे लोग

दर-असल बात तो थी रोने की
जिसपे हँसते रहे बेचारे लोग

मुद्दतों से सवाल है अंदर
उसने जन्नत से क्यूँ उतारे लोग
Nivedan Mishra

Nivedan Mishra | We The Sukhanwar