उसने आँखों से यूँ उतारे लोग
हो गए इक तरफ़ किनारे लोग
ख़ामुशी सुनते ही चले आए
उसने आँखों से भी पुकारे लोग
ढ़ूँढ़िए इस ज़मीन के अंदर
खो चुके हैं बहुत हमारे लोग
जीत लेते हैं एक दिन सब कुछ
याद रखिएगा आप हारे लोग
आज सैलाब का है अंदेशा
और आँखों में इतने सारे लोग
इस तरफ जाइए जहन्नुम है
मुस्कुराते मिलेंगे सारे लोग
दर-असल बात तो थी रोने की
जिसपे हँसते रहे बेचारे लोग
मुद्दतों से सवाल है अंदर
उसने जन्नत से क्यूँ उतारे लोग
Nivedan Mishra