ये भी है हक़ीक़त कि जुदा हो नहीं सकते,
और तुम पा-तह-ए-दिल से फ़िदा हो नहीं सकते।।
आदाब-ए-मुहब्बत से तो वाक़िफ़ हैं कि तन्हा,
हमसे तो फ़रीज़े ये अदा हो नहीं सकते।।
किस वास्ते करते हो ख़ताओं की शिकायत,
इंसान से अब हम तो ख़ुदा हो नहीं सकते।।
सौ बार पलट आए हैं दहलीज़-ए-जिगर पर,
लश्कर तेरी यादों के विदा हो नहीं सकते।।
ख़ामोशी से उतरे हैं ये काग़ज़ की ज़मीं पर,
अल्फ़ाज़ हैं मेरे ये निदा हो नहीं सकते।।
कमरान, ग़लत हैं ये ज़माने की रिवायत,
मुफ़लिस ही ख़ताकार सदा हो नहीं सकते।।
Kamran Abbas