लहज़े में गर उसकी लज़्ज़त नहीं है
समझो के तुमसे मुहब्बत नहीं है
इस दौर का ये है दस्तूर यारों
दौलत नहीं है तो इज़्ज़त नहीं है
माँ बाप की सेवा घर से लगावट
बच्चों में तो अब ये फितरत नहीं है
गर बेहयाई हो इनकम का ज़रिया
पैसों की अब कोई किल्लत नहीं है
चाहे अजय तुम जतन कितने कर लो
रिश्तों की अब कोई कीमत नहीं है
AJAY PRASAD