Shashank Singh Thakur "SAAHIL"

अजब तरह से वो इक दिवाना ख़ुदा को अपनी सुना रहा है
फलक़ से टूटे हुए सितारे से दिल की ख़्वाहिश बता रहा है

वो एक हम हैं जो वस्ल की शब सजा रहें हैं खुद अपना कमरा
और एक महबूब है हमारा जो सीधे बत्ती बुझा रहा है

गुज़र चुके हैं नई मुहब्बत के पाँच हफ्ते शराफतों में
सो छटवे हफ्ते वो शौख़ मुझको मेरी ख़ताऐं गिना रहा है

फिर ऐसे लड़के को क्या कहेंगे,कोई मुसव्विर या कोई पागल
जो नोक-ए-ख़ंज़र से दिल के काग़ज़ पे तेरा चेहरा बना रहा है

ज़मीं पे रहते हुए तो मुझ को किसी ने आवाज़ तक नहीं दी
ये कौन है जो फलक से मुझको हबीब कहकर बुला रहा है

बिछड़ के मुझ से शराब पीने का भूल बैठा है वो सलीक़ा
उसे मिलाना था मय में पानी मगर वो आँसू मिला रहा है

दिखा रहा है कवर वो साहिल मुहब्बतों की किताब का और
सबक़ पढ़ा कर हमें बदन का हमीँ से नज़रें चुरा रहा है
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"