सुख को मुस्कानें दीं, दुख को
आँसू देकर जान छुड़ाई!
छत के पास रहे मँडराते
आशाओं के उड़नखटोले
क्रोध किसी दिन आया भी तो
हमने अपने द्वार न खोले
कुण्ठाओं ने रात-रात भर
घर की सांकल ख़ूब बजाई!
इच्छाओं ने आवश्यकता
बनकर अपना जाल बिछाया
उसी जाल के पीछे छुपकर
चुपके-चुपके लालच आया
यह मत पूछो उस पल हमने
कैसे अपनी लाज बचाई!
कभी वासना दुलहन बनकर
आँगन में छम छम करती है
हाँ यह बात अलग है, सहमी-
है, बातें कुछ कम करती है
पर अब तक छल कपट न आये
कहाँ रह गये दोनों भाई!
Gyan Prakash Akul