जानकी भी नहीं है हिरन भी नहीं!

सब हँसाते रहे पर हँसूँ किस तरह
कोई अवसर नहीं और मन भी नहीं!
मानता हूँ कि ख़ुशियाँ सहेजी नहीं
हाँ, मगर ज़िन्दगी में रुदन भी नहीं!

युद्ध मैंने लड़े और जीते भी हैं
मै जहाँ भी गया पूर्णमासी रही
राज-दरबार में ख़ूब हँसता रहा
पर कलेजे से चिपकी उदासी रही

अब मुकुट के नगीनों में हूँ खोजता
बाँसुरी भी नहीं कुंजवन भी नहीं!

क्या मिला गाँव से दूर आकर मुझे?
भाग्य में जो नहीं था नहीं ही मिला
जिस जगह भी रहा एक दुविधा रही
टूटता ही नहीं पीर का सिलसिला

ये धनुष बाण मेरे हैं किस काम के
जानकी भी नहीं है हिरन भी नहीं!

जो नदी मिल गई पार होता गया
क्या छुटा क्या रहा मै नहीं गिन सका
सारी दुनिया मुझे मेरी अपनी लगे
हो न पाया कभी मैं किसी एक का

कोई वादा किसी से किया ही नहीं
पूर्ण करने को कोई वचन भी नहीं!
Gyan Prakash Akul