INAYAT ALI CHISHTI

आगे बढ़ने को नए ख़्वाब सजाने होंगे
अब के माज़ी के हर इक ज़ख्म भुलाने होंगे

जिसका मतलब न कोई और न कोई रब्त ओ जवाब
ऐसे अशआर भी महफ़िल में सुनाने होंगे

ये ग़रीबों के मसीहा जो बने फिरते हैं
देखना उन के ही तल घर में ख़ज़ाने होंगे

आग जंगल‌ में लगाते हैं खुदी कहते हैं
सांस लेना है तो फिर पेड़ लगाने होंगे

इस तरह छोड़ के जाऊंगा ‘इनायत’ क़िरदार
अगली नस्लों में फ़क़त मेरे फ़साने होंगे
INAYAT ALI CHISHTI