AJAY PRASAD

ये ज़िंदगी यूँ ही जज़्बात से नहीं चलती,
फ़क़्त ये उम्दा ख़यालात से नहीं चलती।

निकलता रोज़ हूँ मैं अपने घर से रोज़ी को,
गृहस्थी चंदे या ख़ैरात से नहीं चलती।

ज़रूरतों से भी तो जंग रोज़ जारी है,
हसीन ख़्वाबों-ख़यालात से नहीं चलती।
AJAY PRASAD