INAYAT ALI CHISHTI

क़ैद–ए–उल्फ़त थी जफ़ा पर भी वफ़ा–कोश रहा
उस ने इल्ज़ाम दिया और मैं ख़ामोश रहा

मुन्तज़िर था के ढले दिन तो नज़र आए चाँद
चाँद निकला तो बहुत देर सियह–पोश रहा

अब के बज़्मों में वफ़ाओं के दरस देता है
एक वो शख़्स जो एहसान–फ़रामोश रहा

क्या असर था ये ग़म ए हिज्र का या था कुछ और
बे–तलब पी के भी कुछ देर मुझे होश रहा

उन से उल्फ़त के तकाज़े भी निभाए न गए
और इक मैं था को हर हाल में मदहोश रहा

उसने बेसाख़्ता आँखों से मिला दी आँखें
फिर मैं कुछ साल तलक रिंद–ए–बला–नोश रहा

उसकी नज़रों से बस इक बार मिली थी नज़रें
मुद्दतें गुज़री मैं बेख़ुद रहा बेहोश रहा

याद आता है 'इनायत' वो अभी तक मुझ को
वादा कर के जो सदा वादा–फ़रामोश रहा
INAYAT ALI CHISHTI

INAYAT ALI CHISHTI | We The Sukhanwar