जिस नदी के तीर मेरी
प्यास अपमानित हुयी है
उस नदी में पाँव धोना भी
नहीं स्वीकार है....।
पत्थरों में प्राण होते हैं कहीं मैंने सुना था
इसलिए पीड़ा सुनाने के लिए पत्थर चुना था
किन्तु मेरी पीर जिनके
पास अपमानित हुयी है
आज उनका देव होना भी
नहीं स्वीकार है....।
वह उसे याचक समझता था गया जो सर झुकाने
एक चुटकी द्वार की मिट्टी न दी सर पर चढ़ाने
तुच्छ मिट्टी की जहाँ पर
आस अपमानित हुयी है
अब वहाँ का रत्न - सोना भी
नहीं स्वीकार है....।
पर समय के मापदण्डों की कहानी कौन जाने
खोज लेती अंततः हर प्यास पानी के ठिकाने
याद है लेकिन जहाँ पर
साँस अपमानित हुयी है
उस जगह का सुख सलोना भी
नहीं स्वीकार है....।
Gyan Prakash Akul