यह समय नकली हँसी मुस्कान का है

ओ अभागे आँसुओं!
तुम आँख से बाहर न आना,
यह समय नकली हँसी मुस्कान का है।

दूर तक दिखता नहीं कुछ भी कहीं भी रोशनी–सा
शूलियाँ तैयार, खोजे जा रहे हर ओर ईसा

प्यास की ख़ातिर कठिन
दो बूंद पानी खोज पाना,
यह समय सुकरात के विषपान का है।

हों रहीं सक्रिय महल में कुछ कुचक्री मन्थराएं
राम को अब चाहिए वह जंगलों की ओर जाएं

और दशरथ को पड़ेगा
क्या भला फिर से बताना,
यह समय भूले हुए वरदान का है।

अर्गलाएं हैं चढ़ी बस पारदर्शी खिड़कियाँ हैं
वे नहीं सुन पा रहे हैं इस तरफ जो सिसकियाँ हैं

घर चलो अब क्या किसी को
पीर का क़िस्सा सुनाना,
यह समय अपना नहीं श्रीमान का है।
Gyan Prakash Akul

यह समय नकली हँसी मुस्कान का है | We The Sukhanwar