Shakeel Jamali

एक मुसाफ़त और किसी सय्यारे की
कुछ तारीखें ख़ाली हैं बंजारे की

दुनिया अब संजीदा होने वाली है
हवा निकलने वाली है गुब्बारे की

कैसा ऊँचा रुत्बा है इन्सानों का
क्या अच्छी क़िस्मत है मिट्टी-गारे की

कितनी ख़ाक उड़ायें एक मुहब्बत में
कितनी गर्दिश देखें एक सितारे की

मत दिखला सपने रौशन मुस्तक़बिल के
मत बुनियादें डाल... नए अँधियारे की

दिल ने तुझसे बाँध तो ली हैं उम्मीदें
लेकिन हालत ख़स्ता है बेचारे की

उसके जैसा कोई तो होगा दुनिया में
निकलेगी कोई तो राह गुज़ारे की

मैं तो जिसको भी उँगली पकड़ाता हूँ
वो ही कौली भर लेता है सारे की
Shakeel Jamali