किस-किसको जाके बोलूँ बताऊँ कि मैं भी हूँ
कैसे मैं सबके ध्यान में लाऊँ कि मैं भी हूँ
जी चाहता है जाके चटानों के दरमियाँ
चिल्लाऊँ, चीख़ूँ, शोर मचाऊँ कि मैं भी हूँ
जिस तरह़ आईने को नज़र आ रहा हूँ मैं
औरों को किस तरह़ नज़र आऊँ कि मैं भी हूँ
दुनिया मिरे वजूद से बेगाना ही सही
क्या आसमान सर पे उठाऊँ कि मैं भी हूँ
कबसे छुपा हुआ हूँ कोई ढूँढता नहीं
कैसे यक़ीन ख़ुदको दिलाऊँ कि मैं भी हूँ
पहचान दोस्ती से तो कुछ बन नहीं सकी
कुछ दुश्मनी ही करके दिखाऊँ कि मैं भी हूँ
अनदेखा जिस तरह़ से किया जा रहा हूँ मैं
अच्छा यही है भूल ही जाऊँ कि मैं भी हूँ
Rajesh Reddy