सुधरे ही नहीं हम तो हैं दीवाने अभी तक
आते हैं सयाने हमें समझाने अभी तक
मजनूँ की उड़ाई हुई इस धूल के सदक़े
आबाद हैं हम जैसों से वीराने अभी तक
जिस शम्अ को रोशन किया परवानों ने जलकर
जलते हैं उसी शम्अ पे परवाने अभी तक
दुनिया ने तो सच मान लिया झूट को कब का
बदले न मगर अपने ही पैमाने अभी तक
क्या जाने अभी कितना लहू और बहेगा
क़ातिल ने उतारे नहीं दस्ताने अभी तक
दुनिया से छुपा रक्खा है ख़ुद में कहीं ख़ुदको
तहख़ानों में महफ़ूज़ हैं तह़खाने अभी तक
झगड़ा न कभी डाल सके दैर-ओ-ह़रम भी
हम रिंदों से आबाद हैं मयख़ाने अभी तक
Rajesh Reddy