गुमाँ हर किसी को यकीं दिख रहा है
जो सच है किसी को नहीं दिख रहा है
ये डर है किसी का या बेहोश हालत
कि आँखों से अब कुछ-नहीं दिख रहा है
जो है सामने सब फरेब-ए-नज़र है
उसे देखिए जो नहीं दिख रहा है
मुसलसल नज़र आ रही है क़यामत
कि आँखों में रोशन-जबीं दिख रहा है
बनाई गई है ये तस्वीर कैसी?
कि चेहरा मुकम्मल नहीं दिख रहा है
बयाबाँ से हम देखते हैं ये दुनिया
मकाँ दिख रहे हैं मकीं दिख रहा है
Nivedan Mishra