AJAY PRASAD

कत्ल कर के मेरा कातिल रो पड़ा
कर सका जब कुछ न हासिल,रो पड़ा ।

था समन्दर खुश डुबो कर के मुझें
अपनी लाचारी पे साहिल रो पड़ा ।

आया था तो वो दिखाने पैतरा
सादगी पे मेरी कामिल रो पड़ा।

जो बने फिरते हैं खुद में औलिया
हरकतों पे उन की जाहिल रो पड़ा ।

की मदद मज़दूर ने मजदूर की
अपनी खुदगर्जी पे काबिल रो पड़ा ।

जा रही थी अर्थी मेरे प्यार की
हो के मैयत में मैं शामिल रो पड़ा ।

बिक गया पैसों की खातिर फैसला
बेबसी पे अपनी आदिल रो पड़ा
AJAY PRASAD