सूरज के दरवाजों पर ताला डाल दिए हैं बादल
एक दूजे से बोल रहे हैं इसका कत्ल करेंगे कल
सूरज मौन रहा सब सुनकर
और हंसी में टाल दिया
क्रोध-अग्नि को गंगाजल में
धीरे-धीरे डाल दिया
सोच रहा है मन में बैठे
अंधकार को भांप ना पाया
ऊपर से बादल ने घेरा
घूम रहा है इतराया
अभी बुलाता हूं लड़ने को अपनी रश्मियों का इक दल
घोर अंधेरा छा जाने से
जीव जंतु भी डरे हुए हैं
चर्चा करते देव-ऋषि सब
संतापों से भरे हुए हैं
उम्मीदों का किला खंगाला
खूब खजाना पाया है
बुरा वक्त जो बीत गया तो
अच्छा दिन भी आया है
धीरे-धीरे ही बीते हैं सुख-दुख के यह दोनों पल
बादल बोले छोड़ रहे हैं
धैर्य बहुत है पास तुम्हारे
अपना जीवन हंस कर जीना
धैर्य बहुत है पास तुम्हारे
तुमसे सीख रहे हैं हम सब
हिम्मत ना हारा करते हैं
तुझमें देख रहे हैं हम सब
हिम्मत ना हारा करते हैं
संदल तुम भी ढूंढ निकालो है खा़र-भरा दुनिया जंगल
अनिल कुमार निश्छल