जो मंसबों के पुजारी पहनके आते हैं
कुलाह तौक़ से भारी पहनके आते हैं
अमीर-ए-शहर तिरी तरह क़ीमती पोशाक
मिरी गली में भिकारी पहनके आते हैं
यही अक़ीक़ थे शाहों के ताज की ज़ीनत
जो उँगलियों में मदारी पहनके आते हैं
हमारे जिस्म के दाग़ों पे तब्सिरा करने
क़मीसें लोग हमारी पहनके आते हैं
इबादतों का तहफ़्फ़ुज़ भी उनके ज़िम्मे है
जो मस्जिदों में सफ़ारी पहनके आते हैं
Rahat Indori