Shashank Singh Thakur "SAAHIL"

हक़-पसन्दों का रक़्स जारी है
तेरे बन्दों का रक़्स जारी है

शर  पसन्दों  का  रक़्स  जारी  है
कुछ  दरिन्दों का  रक़्स  जारी है

आजिज़ी  के  रबाब  पर अब भी
हक़-पसंदों  का  रक़्स  जारी  है

ख़ून  में  डूबे  इक  दुपट्टे  पर
कुछ  दरिन्दों  का रक़्स जारी है

बज़्म-ए-दीवान-गान-ए-उल्फ़त में
अक़्लमन्दों  का  रक़्स जारी  है

आसमाँ दिख रहा है पिंजरे से
कुछ परिन्दों  का  रक़्स  जारी है
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"