अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

जख़्म दिल के भर भी जाएं, पर निशाँ रह जाएंगे
लफ़्ज़ जितने दर्द में थे, बे - बयाँ रह जाएंगे

वक्त रहते जान लेना, तुम गुलों की अहमियत
मौसमों के बाद तनहा , गुलसिताँ रह जाएंगे

आज हैं कल हों न हों ये, मस्तियों की महफ़िलें
एक दिन सारे फ़साने, बस निहाँ रह जाएंगे

इश्क़ तुमसे है बहुत है , यूँ नदी को तीर से
जानते हैं मुन्तज़िर हम, खामखां रह जाएंगे

आ चलें कुछ गुफ्तगू हम ख़्वाब में आकर करें
अनकहे अहसास फिर भी , दरमियाँ रह जाएंगे

आज हैं तो बैठ लो कुछ, बात भी आकर करो
बिन तुम्हारे दिल की बस्ती में, मकाँ रह जाएंगे
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

अंकित शर्मा 'इषुप्रिय' | We The Sukhanwar