बहनों से गृह सरिता

संबंधों के सेहन में जिनके स्वर कलरव करते हैं।
उन बहनों से गृह सरिता के पावन पुलिन पुलकते हैं।।

कोप पिता का पिया हमेशा, अनुजों के संरक्षण में।
स्वयं स्नेहवश मन की मनसा व्यक्त न की संभाषण में।
दिखी न्यूनता भोजन की तो झूठी होना वरण किया।
क्षुधा न जाने दी भाई हित स्वादों के आकर्षण में।।

उसका अधिक समर्पण घर में जिसे परायी कहते हैं।
उन बहनों से गृह सरिता के पावन पुलिन पुलकते हैं।।

माँ की अपर अनुकृति अनुपम स्वसा रही है भूतल पर।
सकल सदन की सुंदरता को सहज सहेजें जीवन भर।
माता- पिता अगर हैं जग में त्याग -प्रेम की सीमाएँ।
सहोदरी ने मध्य समूचा साध रखा है अपने कर।

सहयोगी कर जिनके अक्षमता में क्षमता बनते हैं।
उन बहनों से गृह सरिता के पावन पुलिन पुलकते हैं।।

रक्षा का प्रतिमान बना छोड़ी निर्भयता भाई पर।
बहन बाँधती विश्वासों के रक्षासूत्र कलाई पर।
रोली -अक्षत से अक्षत करतीं बहनें सौभाग्य सदा।
सेतु- बंध करतीं मंगल का वैषम्यों की खाई पर।।

जिनकी मधुर उपस्थिति से उत्सव उत्साहित रहते हैं।
उन बहनों से गृह सरिता के पावन पुलिन पुलकते हैं।।
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'

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