हम-तुम एक डाल के पंछी, आओ हिल-मिलकर कुछ गाएँ।
अपनी प्यास बुझाएँ सारी, धरती के आँसू पी जाएँ।।
अपनी ऊँचाई पर नीले
अम्बर को अभिमान बहुत है।
वैसे इन पंखों की क्षमता,
उसको भली प्रकार विदित है।
तिनके चुन-चुनकर हम आओ! ऐसा कोई नीड़ बसाएँ।
जिसमें अपने तो अपने, कुछ औरों के भी घर बस जाएँ।।
धूल पी गई उसी बूँद को,
जो धारा से अलग हो गई।
हवा बबूलों वाले वन में,
बहते-बहते तेज़ हो गई।
इधर द्वारिका है, बेचारे शायद कभी सुदामा जाएँ।
आओ हम उस की राहों में काँटों से पहले बिछ जाएँ।।
कौन करेगा स्वयं धूप सह,
मरुथल से छाया की बातें।
रूठेंगे दो-चार दिनों को,
चन्दा और चाँदनी रातें।।
अपत हुए सूखे पेड़ों की हरियाली वापस ले आएँ।
चातक से पाती लिखवाकर मेघों के घर तक हो आएँ।।
SHANKAR LAL DWIVEDI