Zafar Iqbal

थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते-करते
कुछ और थक गया हूँ आराम करते-करते

अंदर सब आ गया है बाहर का भी अँधेरा
ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते-करते

ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है
बदनाम होते-होते बदनाम करते-करते

फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में
तंग आ गया हूँ दिल को यूँ दाम करते-करते

कुछ बे-ख़बर नहीं थे जो जानते हैं मुझको
मैं कूच कर रहा था बिसराम करते-करते

सर से गुज़र गया है पानी तो ज़ोर करता
सब रोक रुकते-रुकते सब थाम करते-करते

किसके तवाफ़ में थे और ये दिन आ गए हैं
क्या ख़ाक थी कि जिसको एहराम करते-करते

जिस मोड़ से चले थे पहुँचे हैं फिर वहीं पर
इक राएगाँ सफ़र को अंजाम करते-करते

आख़िर 'ज़फ़र' हुआ हूँ मंज़र से ख़ुद ही ग़ायब
उस्लूब-ए-ख़ास अपना मैं आम करते-करते
Zafar Iqbal

Zafar Iqbal | We The Sukhanwar