Yaadon ka naqsh

मिलते हैं लिफ़ाफ़े में मोहब्बत के ख़ज़ाने,
जिनमें हैं मेरे इश्क़ के मशहूर फ़साने।
पढ़ता हूँ तो लब मेरे ये देते हैं दुहाई,
होती न मेरे दिल की कभी उनसे जुदाई।

फिर याद मुझे आता है माज़ी का समुंदर,
वहम चला करते थे चमनज़ार के अंदर।

ख़ुशरंग थे फूलों की तो ख़ुशबू की हवा थी,
तितली थी कहीं तो कहीं चिड़ियों की सदा थी।
दिल में तो मेरे बस तेरी तस्वीर जवाँ थी,
हाथों में तेरा हाथ था और उम्र रवाँ थी।

वो बीते हुए दिन मेरे होते हैं पुराने,
ख़ुशियों के गुज़र जाते हैं जल्दी से ज़माने।

अब हाल को अपने मैं बयां कर नहीं सकता,
यादों का तेरी ग़ुल मैं दिया कर नहीं सकता।
जाने का तेरे दूर गिला कर नहीं सकता,
जो तुझसे मिला दर्द अयाँ कर नहीं सकता।

हो जाती है तन्हाई ही अब मेरा मुक़द्दर,
मिट जाते हैं आँखों से मेरी माज़ी के मंज़र।
Kamran Abbas