प्यार ओ वफ़ा के सारे फसाने से चल दिए।
कुछ लोग दूर अपना बनाने से चल दिए
आए थे बनके वो तो मसीहा मेरे लिए।
जो ज़ख्मे क़ल्ब मेरे दिखाने से चल दिए
चश्म-ए-ज़िया के नूर को दामन से बांधकर,
अश्कों के साथ हम तो फसाने से चल दिए।
रूठे हुए जो लोग थे बस एक बार में।
सब कुछ भुलाके मेरे मनाने से चल दिए।
रंजिश थीं दूरियां थीं मगर इसके बाद भी
उस बेवफ़ा की सिम्त बुलाने से चल दिए
वो मेरे हमसफ़र थे या मेरे रक़ीब थे।
जो क़िस्सा-ए-वफ़ा को सुनाने से चल दिए।
अपनी ग़ज़ल तो बिन तेरे पूरी न हो सकी
कुछ शेर कहके हम तो ज़माने से चल दिए।
आख़िर को कामरान बयाबान-ए-दश्त से।
ज़ख़्म-ए-ग़म-ए-हयात उठाने से चल दिए।
Kamran Abbas