Anuj Abr

सुब्ह सुनहरी हो तेरी हर शाम तेरी सिन्दूरी हो
ख़्वाब मुकम्मल हो तेरे हर ख़्वाहिश तेरी पूरी हो

रहने वाले इक दूजे के दिल में भी रह लेते हैं
दो जिस्मों के बीच भले ही चाहे जितनी दूरी हो

खोज रहा है जिस ख़ुशबू को व्याकुल होकर जंगल में
हो सकता है उस मृग के भीतर ही इक कस्तूरी हो

इस दुनिया में 'अब्र' किसी को याद तभी हम करते हैं
या तो कोई काम पड़ा हो या कोई मजबूरी हो

"अब्र" पसीना जिस्म से उनके सूखे उससे पहले ही
हर मेहनत-क़श मज़दूरों के हाथों में मज़दूरी हो
Anuj Abr

Anuj Abr | We The Sukhanwar