ख़त

हमारे हाल से कैसे कोई अंजान रह पाता
निगाहों ने बताया ख़ुद ब ख़ुद जो हाल दिल का है
कहीं पर एक भी मिसरा नहीं जो सच छुपाता हो
कहीं एहसास तारी हों तो आंसू ख़ुद छलक जाएँ
कहीं पन्ने अधूरे हैं मगर जज़्बात पूरे हैं
कहीं पन्ने भरे हैं पर पढ़ो तो कुछ नहीं मिलता
अरे मिलने से याद आया, तुम्हारा ख़त नहीं आया
सदा दे कर तुम्हें ख़ामोश होना ठीक लगता है
सो मैं ख़ामोश हूँ और बात सारी तुमको करनी है
चले आओ, या मैं आऊँ? कहो क्या ठीक लगता है
Gautam Sharma