Shashank Singh Thakur "SAAHIL"

वो शब का मंज़र हमें ख़्यालो में आ के कितना सता रहा था
वो मरमरी सा बदन जो कल शब की चाँदनी में नहा रहा था

है बदग़ुमानी का ये नतीजा कि ऐसे हालात हो गए जो
वो बन के बैठा है मेरा क़ातिल कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था

अब इस पे लड़ना नहीं मुनासिब शराब थी या वो विष का प्याला
सुहानी शब थी मैं पी रहा था जो मेरा हमदम पिला रहा था

यही सबब है कि क़ाफिला जो लुटा है मंज़िल पे मेरा आकर
वही था रहजन उसी ने लूटा जिसे मैं रहबर बता रहा था

जो दास्ताँ मैं सुनाने बैठा था बेवफा की तो मेरे दिलबर
तुझे क्या डर था तू मेरी बातों को सुन के क्यूँ मुँह छिपा रहा था

वो जिसने वादा किया था मुझसे के राज़ मेरे नहीं कहेगा
वो एक दिन एक अजनबी को मेरी कहानी सुना रहा था

अब ऐसे गुलशन से ख़्वाहिशें क्या लुटाएगा वो बहार हम पर
चमन ही कांधे पे फस्ल-ए-ग़ुल का वो जब जनाज़ा उठा रहा था

है मेरी ख़ुद्दारी अब भी ज़िन्दा मुझे यकीं है ख़ुदा पे साहिल
किसी शहंशाह के ताज को क्या यूहीं मैं ठोकर लगा रहा था
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"

Shashank Singh Thakur "SAAHIL" | We The Sukhanwar