हमें संशय हुआ

पत्थरों ने जब स्वयं को देवता घोषित किया
तो समय के देवताओं पर हमें संशय हुआ!

कौन कितना देवता है
पत्थरों में होड़ है
एक दूजे को कहेंगे देवता
गठजोड़ है

बेहया ने जब स्वयं को मधुलता घोषित किया
तो भ्रमर की चेतनाओं पर हमें संशय हुआ!

हर भ्रमर है शीघ्रता में
लूट उपवन में मची
फूल सारे एक जैसे
गंध अब क्या ही बची

जुगनुओं ने सूर्य को जब लापता घोषित किया
तो निशा की सब कथाओं पर हमें संशय हुआ!

साल, शीशम, नीम कोई
बाँस कोई चीड़ है
हर तरफ कठपुतलियों की
एक भ्रामक भीड़ है

पुतलियों ने प्राण को जब मूर्खता घोषित किया
तो सभी परमात्माओं पर हमें संशय हुआ!
Gyan Prakash Akul