Nitesh Divya

लागत से ऊपर जो क़ीमत होती है
वो ही कारीगर की मेहनत होती है

हर पत्थर मूरत थोड़ी बन सकता है
पत्थर की भी अपनी क़िस्मत होती है

सबके जैसे तुम क्यों छोड़ नहीं जाते?
तुमको भी तो मुझसे दिक़्क़त होती है

जीने का हर तौर है बदला तेरे बाद
फिर भी अपने आपसे नफ़रत होती है

हर कोई तो अपनी जान नहीं लेता
सबमें थोड़ी इतनी हिम्मत होती है

तय है उसका ख़ाली-पन से भर जाना
जिसको सबके साथ की आदत होती है

तुमसे ये उम्मीद नहीं थी लेकिन... दोस्त!
डसना ही साँपों की फ़ितरत होती है

प्रेम ही है बस जिसका कोई मोल नहीं
वर्ना हर इक शय की क़ीमत होती है

बूढ़े लोग ही घर को जोड़के रखते हैं
दीवारों के ऊपर ही छत होती है

करते हैं चारण बनकर महिमा-मंडन
जिनको भी इस दौर में उजलत होती है

जेल में होंगे सत्ता को चुभने-वाले
इसकी प्रायिकता शत प्रतिशत होती है
Nitesh Divya

Nitesh Divya | We The Sukhanwar