जो हुए ही नहीं बीमार, नहीं समझेंगे
दर्द-ए-उल्फ़त को मेरे यार, नहीं समझेंगे
बात अच्छी है मगर बात मोहब्बत की है
जिस्म के जो हैं तलबगार नहीं समझेंगे
इतना तय है कि हमें फिर से झुलसना होगा
दर्द को क़ौम के सरदार नहीं समझेंगे
इतना तो तय है कि हम कितना भी रो लें गा लें
बे-गुनाही को समझदार, नहीं समझेंगे
हुस्न की बात नहीं बात मोहब्बत की है
जिनका है जिस्म का व्यापार नहीं समझेंगे
खोटे सिक्कों का चलन इतना है बाज़ारों में
लोग कलदार को कलदार नहीं समझेंगे
देखकर हुस्न, मोहब्बत नहीं की है लेकिन
यार मेरे हैं समझदार, नहीं समझेंगे
Aatish Indori