Shashank Singh Thakur "SAAHIL"

ये हुनर तो मुझ को मिला नहीं तेरे दिल मेें अपना घर करूँ
सो मैं यूँ करूँ के तमाम शब तेेरी ख़ुशबूओं में सफर करूँ

मैं तेरी गली का फक़ीर हूँ मेरी आरज़ू तेरी दीद है
तुझे देखने की तलब है जो ये नज़र इधर से उधर करूँ

मुझे इस तरह से सता न तू कहीं तुझ से राब्ता तोड़ कर
तेरी याद से फले पेड़ को मैं झंझोड़ कर बे-समर करूँ

मेरी ग़फलतों को सुधार तू मैं नया हूँ इश्क़ के खेल में..
मुझे माफ करना ना भूलना जो ख़ता कोई मैं अगर करूँ

वो ज़हर जो मैं ने चखा है अब वो असर करेगा सुबह तक
सो बदल बदल के मैं करवटें अभी इंतज़ार-ए-सहर करूँ
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"