वो जो चश्मा लगा के बैठे हैं
मुझ पे नज़रें जमा के बैठे हैं
मुझ पे कीचल उछालने वालों
तुम से कितने घुमा के बैठे हैं
दो–दो कोड़ी के लोग मेरे ख़िलाफ़
लाखों बातें बना के बैठे हैं
तू ही कर फ़ैसला है हक़ पर कौन
हम तेरे दर पे आ के बैठे हैं
अहल–ए–महफ़िल तो रक़्स–ए–बिस्मिल हैं
और वो मुस्कुरा के बैठे हैं
जो नहीं हूँ मैं उसका है ऐलान
मैं जो हूँ वो छुपा के बैठे हैं
जानता हूँ बिछड़ के वो मुझसे
किस के पहलू में जा के बैठे हैं
बे-हुनर को दिया गया ऐज़ाज़
बा–हुनर सर झुका के बैठे हैं
हम 'इनायत' अज़ल से हैं मौजूद
कब किसी को उठा के बैठे हैं
INAYAT ALI CHISHTI