INAYAT ALI CHISHTI

था मुमकिन ही कहां वो साहिब–ए–क़िरदार हो जाते
हमारे साथ जो चलते तो दरिया पार हो जाते

दुआऐं दो हमें बरसों से हम सोते रहे वरना
तुम्हें दिक्कत न हो जाती अगर बेदार हो जाते

ग़नीमत है जो मुद्दत से हमारी बंद हैं आँखें
तुम्हें सोने नहीं देते अगर बेदार हो जाते

ये आलम है अभी भी ख़ौफ़ खाती हैं कई नस्लें
क्या होता सच में हम जो लश्क़र–ए–जर्रार हो जाते

मेरी छोड़ों कि मैं आवारा बदक़िरदार लड़का हूँ
मेआरी बनने वालों तुम ही बा–क़िरदार हो जाते

हमारी हालतें ऐसी न होती इस गुलिस्तां में
हमारे नौ–जवां गरचे अलम–बरदार हो जाते

तरीक़े मिल गए जीने के जैसी दुनिया वैसे हम
वगरना कब के मर जाते जो हम ख़ुद्दार हो जाते

बिछे रहते थे तेरी राहों में हम फूल बन कर के
क़दम भर भी न चल पाता तू गर हम ख़ार हो जाते

मेरी फ़ितरत नहीं ऐसी कि पत्थर मारु कीचड़ में
जो होता मैं भी तुम जैसा तो तुम मिसमार हो जाते

बड़ी ज़िल्लत का बाइस है ‘इनायत’ ख़्वाहिश–ए–दुनिया
ये दुनिया छोड़ देते तुम तो इज़्ज़त–दार हो जाते
INAYAT ALI CHISHTI