वो चश्म-ए-हुस्न–ज़ार से आगे नहीं गया
मयकश कभी ख़ुमार से आगे नहीं गया
उतना ही तुझको चाहा था जितना तू सह सके
मैं भी तेरे मेयार से आगे नहीं गया
झुकता जो तेरे दर पे झुका देते हम मगर
सर नक़्श-ए-पा-ए-यार से आगे नहीं गया
था जाल या कमाल मगर कुछ तो बात थी
कोई भी कू-ए-यार से आगे नहीं गया
फ़ुरसत मिली न हमको किसी ग़ैर के लिए
ये दिल ख़्याल-ए-यार से आगे नहीं गया
ले जाना चाहता था उसे मैं तो चाँद पर
अफ़सोस वो ग़ुबार से आगे नहीं गया
इक तुम थे जो हुदूद से आगे निकल गए
इक मैं था जो हिसार से आगे नहीं गया
फ़रहाद ने गवारा किया देना जाँ मगर
शीरी तुम्हारे प्यार से आगे नहीं गया
शोहरत-वक़ार मुझको इनायत मिले मगर
मैं अपने इख़्तियार से आगे नहीं गया
INAYAT ALI CHISHTI