कभी का जानते हैं हम तुम्हारे खानदानों को।
दिखाते फिरते ही रहते हो अपनी झूठी शानों को।
तुम्हें किसने दिया है हक़ किसी की जान लेने का,
बताओ मार क्यों देते बेचारे बेजुबानों को।
हमारे घर के आंगन में कभी दीवार ना होगी,
ये कहके छोड़ आया गांव में अपने मकानों को।
बड़ी मुद्दत के बाद उसने मुझे ऐसे पुकारा है
लगा दी आग हमने आज सारे ही बहानो को।
हमारा जिस्म होगा राख या जब खाक होगा 'दीप',
तभी छुट्टी मिलेगी ज़िंदगी के इम्तहानों को।
Deepak Malviya