अंधेरे नूर की बातें कहां समझते हैं
ये रोशनी तो फ़कत आसमां समझते हैं
फ़रोग़ देते रहो तुम इसे ज़माने में
ये वो ज़बां है जिसे बेज़ुबां समझते हैं
हमीं सजाते रहेंगे इसे जबीनों पर
हम अपने मुल्क की मिट्टी को मां समझते हैं
उसी ने राह में लूटा है कारवां ग़ाफ़िल
जिसे भी राह का हम राज़दां समझते हैं
Anwar gafil