Anwar gafil

अंधेरे नूर की बातें कहां समझते हैं
ये रोशनी तो फ़कत आसमां समझते हैं

फ़रोग़ देते रहो तुम इसे ज़माने में
ये वो ज़बां है जिसे बेज़ुबां समझते हैं

हमीं सजाते रहेंगे इसे जबीनों पर
हम अपने मुल्क की मिट्टी को मां समझते हैं

उसी ने राह में लूटा है कारवां ग़ाफ़िल
जिसे भी राह का हम राज़दां समझते हैं
Anwar gafil

Anwar gafil | We The Sukhanwar