Shashank Singh Thakur "SAAHIL"

बाद मुद्दत के हुआ हम को मयस्सर काग़ज़
रख लिया हम ने तिजोरी में छुपा कर काग़ज़

मैं ने नीलामी में रक्खा है दिल-ए-मुज़्तर को
उस ने रक्खा है मेरे दिल के बराबर काग़ज़

हम ने हर मौज पे लिक्खी थी सनम दिल की बात
था हमारे लिए जैसे के समंदर काग़ज़

सारे दरवाज़े मुक़फ़्फ़ल हैं तुम्हारे दिल के
हाए ! जाए तो कहाँ ले के कबूतर काग़ज़

लम्स पाया है सनम जब से तिरे होठों का
आज भी है तिरी ख़ुशबू से मुअत्तर काग़ज़

ग़म के अफ़साने को तहरीर किया था जिस में
रो पड़ा आज वो पढ़ कर दिल-ए- मुज़्तर काग़ज़

उस को सीने से लगा रक्खा है हम ने साहिल
लब-ए-मेहबूब को आया था जो छू कर काग़ज़
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"