मेरी पूँजी बस इतनी है! उर में बसी तुम्हारी यादें
नील गगन में धवल बदलियांँ ज्यों अपना आँचल फैला दें।
कोई याद कभी आकर इन आँखों को हरषा जाती है
कभी याद गंगा-यमुना बन आँखों को बरसा जाती है।
सुधियों के इस तहख़ाने में मैंने तुम्हें छिपा रक्खा है
अंधकार से भरी कोठरी में ज्यों एक दिया रक्खा है।
पीड़ाओं का महाकाव्य है एक साँस में कैसे गा दें?
तुमको पाकर इतराया था, तुमको खोकर टूट गया हूँ
पकड़ी थी उँगली पर उससे जाने कैसे छूट गया हूँ।
जंगल-जंगल भटक रहा हूँ कोई साध नहीं पूरी है
ज्यों भोले-भाले हिरना को कभी न मिलती कस्तूरी है।
बधिरों की बस्ती में लेकर घूम रहा हूँ मैं फ़रियादें!
इच्छाओं का इन्द्रधनुष भी कभी न पूरा हो पाता है।
एकरंग जब खिल पाता है दूजा तब धुँधला जाता है।
हृदय पोटली खोलन पाया दीन सुदामा के चावल-सा
बिन बरसे ही लौट गया हूँ अंबर के श्यामल बादल-सा।
उससे झूठे वादे करके कैसे चाँद-सितारे ला दें?
डॉ० राघवेन्द्र मिश्र 'प्रणय'