वह नदिया बनना अच्छा है

वह नदिया बनना अच्छा है जो जग की प्यास बुझा जाये।
सागर बनकर क्या मिला अगर हम खारा जल ही ला पाये।

दो घूँट अमिय की आशा में
कितने मदरांचल घिस डाले।
विषपान कराया सदा उन्हें
जो शंकर सम भोले-भाले।

वह बगिया बनना अच्छा है जो जीवन को महका जाये।
जंगल बनकर क्या मिला अगर हम पंथी को भटका आये।

तप से कंपित होने वाला
इंद्रासन पाकर क्या होगा?
अप्सरा और मदिरा भोगी
सिंहासन पाकर क्या होगा?

वह कुटिया बनना अच्छा है जो जप-तप-ध्यान सिखा जाये।
राजन बनकर क्या मिला अगर हम प्रजा नहीं अपना पाये।

तपती बालू पर चलते जो
वे पद ही पूजे जाते हैं।
सूली पर चढ़कर ही यीशू
ईसा-मसीह बन पाते हैं।

वह चिट्ठी बनना अच्छा है जो प्रिय का हाल बता जाये।
पोथी बनकर क्या मिला अगर हम प्रेम नहीं सिखला पाये।
डॉ० राघवेन्द्र मिश्र 'प्रणय'