Kamran Abbas

दिल के ज़ख्मों को रग-ए-जाँ में उतरते देखा,
साथ उसके जो किसी ग़ैर को चलते देखा।

चांद तारों ने ये मुंसिफ को गवाही दी है।
बादे फ़ुर्क़त ना इसे चैन से सोते देखा।

दोस्त तो दोस्त है हालात-ए-सितम में मैंने।
खू के रिश्तों को भी दामन है छुड़ाते देखा।

अश्क ए माज़ी को यूँ नज़रों में समा रखा हैं।
एक मुद्दत हुई सूरज ना निकलते देखा।

तेज़ आधी में भी दहलीज़ ए जिगर पर अपने
एक उम्मीद की शम्मा को हैं जलते देखा।

दिल की गहराई से पलकों के किनारे आकर।
हमने अश्कों को बहुत शोर मचाते देखा।

आज फिर याद वो आया है मुझे एहदे वफ़ा।
जिसके लफ़्ज़ों को हवाओं में बिखरते देखा ।

हमने बस इश्क़ ओ मुहब्बत के फ़सानों के सिवा।
कोई किस्सा न कभी उसको सुनाते देखा।

तुमने कमरान बहुत ज़ख़्म उठाये लेकिन ।
कोई शिकवा न कभी बख़्त से करते देखा ।
Kamran Abbas