Satyendra Govind

कितने सपने देख रखे थे माई ने
सब पे पानी फेर दिया भौजाई ने

घर का झगड़ा सड़कों तक आ पहुँचा है
पर्वत का आकार लिया है राई ने

बातों की बरछी से मुझको मारा है
दुश्मन जैसा काम किया है भाई ने

महफ़िल-महफ़िल ढूँढ़ रहा था ख़ुद को मैं
मुझको मुझसे मिलवाया तन्हाई ने

जब तक धूप रही वो मेरे साथ रही
हाथ छुड़ाया फिर मेरी परछाई ने
Satyendra Govind

Satyendra Govind | We The Sukhanwar