प्यार की पूर्णिमा को ग्रहण लग गया

अनमने-अनमने हम अलग हो गए
फिर तुम्हारा कहीं और मन लग गया
वासना की अमावस घनी हो गयी
प्यार की पूर्णिमा को ग्रहण लग गया

आज संवाद बीते दिनों से हुआ
और कुछ चित्र फिर आ गये सामने
याद आने लगा प्यार आरंभ से
किस तरह कुछ घरौंदे मिटे या बने

एक अपराध महसूस होने लगा
ज्यों किसी देवता को चरन लग गया

कुछ जमा-सा लहू आँख से गिर पड़ा
क्या हुआ क्यों भला दृष्टि ही खो गयी
द्वारका के महल और ऊँचे हुये
एक दिन राधिका अजनबी हो गयी

एक बेचैन-सी आयु को ढो रहे
शाप जैसा किसी का वचन लग गया

उग रहे सूर्य का खूब स्वागत हुआ
जुगनुओं के शवों को बिसारा गया
सूर्य फिर खो रहा है क्षितिज में कहीं
तो मरे जुगनुओं को पुकारा गया

रात-भर फिर अँधेरा हँसा देखकर
मन कहीं दूर करने रुदन लग गया
Gyan Prakash Akul