तग़ाफ़ुल से वो जब हम को भुला कर बैठ जाते हैं
हम अपने आंसूओं को फिर दबा कर बैठ जाते हैं
कोई पूछे ज़रा उस डूबने वाले पे क्या गुज़री
तमाशा देखने वाले तो आ कर बैठ जाते हैं
बहुत से लोग ऐसे हैं जो मंज़िल पर पहुँचते हैं
बहुत से लोग तो तलवे जला कर बैठ जाते हैं
ये सुनते हैं की उस महफ़िल में इक महताब आता है
तो हम भी आज उस महफ़िल में जा कर बैठ जाते हैं
परिंदे जब कभी थकते हैं दिन भर की मशक़्क़त से
तो फिर पेड़ों की शाख़ों पर ये आ कर बैठ जाते हैं
तुम्हारा नाम जब नोक-ए-क़लम पर रक़्स करता है
तो हम स्याही में खून-ए-दिल मिला कर बैठ जाते हैं
हम ऐसे मय-कशान-ए-दीद हैं की शाम होते ही
तुम्हारी याद को दिल में बसा कर बैठ जाते हैं
सलीक़ा ही नहीं उन को किसी भी ग़म को सहने का
परीशां हो के जो यूँ कसमसा कर बैठ जाते हैं
हम उन के पास अपना दिल लिए जाते हैं जब साहिल
तकब्बुर से वो उठ के दूर जा कर बैठ जाते हैं
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"