प्रेरणा जब है नहीं तो मैं सृजन कैसे करूँ
भावना उर में नहीं तो मैं भजन कैसे करूँ
मैं अवज्ञा हूँ नही अवहेलना भी हूँ नहीं
जिंदगी का छोर अंतिम हूँ यजन कैसे करूँ
आपके सानिध्य से कानन बसन्ती ही रहे
मैं भला कानन-हृदय को अब अजन कैसे करूँ
दूर इतनी आ गये सम्बन्ध के सत्मार्ग पर
उम्र की आखिर घड़ी है तब तजन कैसे करूँ
आ गया जब वक्त ही अपनी विदाई का सखे
आपके सँग मैं भला अब भी व्रजन कैसे करूँ
अनुपम पाण्डेय 'अनहद'