Kamran Abbas

ज़ख्म अपना छुपाके बैठे हैं
हम कहीं दिल लगाके बैठे हैं

उनकी दिलकश भरी निगाहों में
अपने सपने सजाके बैठे है

तेरी महफिल में अपने शेरों से
रंग अपना जमाके बैठे हैं

तेरे उल्फत के सारे दावों का
घर में मातम मनाके बैठे हैं

रोज़ ए हिजरत तुम्हारी यादों में
शम्मा घर की बुझाके बैठे हैं

हम तो दुश्मन से भी अदावत में
हाथ अपना मिलाके बैठे हैं

एक तेरे गम में सारी दुनियां को
अपने दिल से भुलाके बैठे हैं

कामरान उनकी याद में अब तक
दिल को अपने जलाके बैठे हैं
Kamran Abbas