Kamran Abbas

मैं वादा-ख़िलाफ़ी का हुनर देख रहा हूँ,
बदले हुए लहजे में असर देख रहा हूँ।

आने से तेरे बज़्म में था मेरी उजाला,
लगता था ज़मीं पर मैं क़मर देख रहा हूँ।

जिस शहर को छोड़ा था तेरी ज़ात की ख़ातिर,
उस शहर में मैं अपनी क़बर देख रहा हूँ।

जिन पेड़ों को गिरते हुए तूफ़ाँ में न पाया,
आते हुए उन्हीं पा समर देख रहा हूँ।

तश्ना लबों से छीन के पानी के सहारे,
मकतल में मैं ज़ालिम का ज़बर देख रहा हूँ।

मुफ़्लिस को मयस्सर नहीं दो वक़्त की रोटी,
और अब तो मैं सूखे का कहर देख रहा हूँ।

जाने क्या लिखा है यहाँ तक़दीर में मेरी,
करते हुए मैं ख़ुद को सफ़र देख रहा हूँ।

सब लोग पशेमाँ हैं यहाँ अपने किए से,
इस शहर में मैं सबकी नज़र देख रहा हूँ।

अब्बास! पा भी नज़रे-करम हो मेरे मौला,
मुद्दत से मैं बस ख़्वाब-ए-सहर देख रहा हूँ।
Kamran Abbas

Kamran Abbas | We The Sukhanwar